Home   अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

महासागर में हिंद की मित्रता की नई तरंगे


भारत मॉरीशस के सम्बन्ध सदियों  से बहुत अच्छे रहे है। पर आज जब हम मॉरीशस की  बात कर रहे है तो मारीशस के साथ और जुड़ा हुआ महसूस कर रहे है। मौजूदा समय में मॉरीशस के प्रधान मंत्री का पहले  भारत आना हमे और भी करीब लता है।

मारीशस की 1.296 मिलियन की आबादी में 68% लोग भारतीय मूल से तालुक रखते है वहीं हिंदी और भोजपुरी भाषा से लेकर हिंदुस्तानी संगीत, कथक, तबला और योग तक एक जैसी  बोली और समझी भी जाती  हैं। यह सब कुछ 2 नवंबर, 1834 को शुरू हुआ था जब भारतीय मजदूरों का पहला जत्था गन्‍ना (ईख) बगानों में काम करने के लिए एमवी एटलस पर सवार होकर इस द्वीपीय देश पर पहुंचा। जिस कारण वहां के लोगो को भारत से अपेक्षा रखना स्वाभाविक है।

भारत मॉरीशस का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, और पिछले आठ सालों से मॉरीशस को सबसे बड़ा निर्यातक रहा है। मॉरीशस के साथ जहा सन २०१२-१३ में  निर्यात 1.31 बिलियन यूएस डालर का रहा  और आयात 28.49  मिलियन यूएस डालर का ब्यौपार रहा है। मॉरीशस भारत में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश (एफडीआई) का सबसे बड़ा स्रोत रहा है। वर्ष 2012-13 के दौरान मॉरीशस से भारत में 9.497 यूएस डालर का एफडीआई रहा है। वित्तीय वर्ष (2013-14) भारत में मॉरीशस से 4.85 बिलियन यूएस डालर का एफडीआई प्राप्त हुआ। वहीं हम ना की व्यापारिक बल्कि सुरक्षा सांस्कृतिक के दृष्टिकोर से भी एक दूसरे  के साथ है।

भारत को हर संभव सहायता करना चाहिए और कर भी रहा है। हम जहां आज मंगल ग्रह तक पहुंचने  में कामयाब है, वही टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में  भी पीछे नहीं है। मॉरीसस के मानवीय विकास में हम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। हमने देखा हैं की आपसी रिश्ते ऊपर निचे होते रहते हैं  पर   टेक्नोलॉजी  सहयोग एक दुसरे को जोड़े रखने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है। जैसे गूगल की बात करे कितनी ही सर्विसेज है जिस  से अलग होना आसान नहीं है। हम आधार  (U I D) की बात करे तो हम इस क्षेत्र में  बहुत बड़ा सहयोग  सकते है। हमारे पास एक  एस्टाब्लिसट सेटअप है। केवल इस  से हम जोड़ सके तो न की एन्वॉयरमेंट फ्रेंडली बल्कि पेपर लेस (biometric quick real-time) आवागमन का रेकार्ड रख सकते है, और भविष्य में हमे आपस में आने जाने के लिए पासपोर्ट की  जरुरत ना पड़े। एसे ही जीपीएस नाविक और उपग्रह सेवा (satellite service) में कर सकते हैं।  हमने किया भी है, जैसे की सार्क उपग्रह (SAARC Satellite) का मिसाल मिलता है।  वैसे ही हम सभी पड़ोसी देश के साथ आधार  (U I D) जैसे सेवा का विस्तार या जोड़  सकते हैं।  इस से बहुत सारे  लोगो को नौकरियां मिलेगी और वह के लोगो का उन्नति भी होगा। भविष्य में  संयुक्त सहयोग से  इस तरह का और भी प्रौद्योगिकी विकास किया जा सकता है।  ताकि सम्बंद और अधिक मजबूत बनाया जा सके। और यहां के लोगों को और अधिक  रोजगार उपलब्ध कराया जा सके।

ep

दुनिया का करीब ४० प्रतिशत कच्चा तेल आपूर्ति और भारत का ६४ प्रतिशत हिस्सा तेल का व्यापार हिंदमहासागर से होकर गुजरता है।  भारत के लिए मॉरीशस केंद्र की भूमिका निर्वाह करता है।  हमारे सम्बन्ध अफगानिस्तान, ईरान, UAE, ओमान, श्रीलंका, बांग्लादेश के साथ अच्छे है।  और हम ईरान  श्रीलंका बंगलादेश में पोर्ट भी बना रहे है।  जो की हिन्दमहासागर के सुरक्षा के ले बहुत आवश्य्क  है। आप उपरोक्त मानचित्र में  हरे रंग के बिंदु को देख सकते है, जहा  हमेशा हमले का शिकार होते रहते है।    हमने सेशेल्स , Madagascar, मॉरीशस , पोर्टव्लेर मे रडार स्थापित  है।  ताकि हिंद महासागर में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। हमने इस दिशा में  नौसेना का अड्डा भी पोर्टव्लेर मे स्थापित किया है।

पूर्वी अफ्रीका तक पहुंचने के लिए हिंद महासागर एक महत्वपूर्ण मार्ग है, वही पूर्वी अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना,  चीन जैसे देशों के आर्थिक विकास में  महत्वपूर्ण योगदान रखता है।  यह आश्चर्य की बात नहीं होगी की  चीन जैसे अन्य बढ़ती शक्तियां हिंद महासागर का नियंत्रण पाने में दिलचस्पी लेंगी। अभी भी  US ने हिन्द महासागर के बीच में नौसेना का अड्डा बना रखा है। इसलिए  चीन अभी से  हिंद महासागर  शिपयार्ड बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ रही है। तब भारत के लिए और भी जरुरी हो जाता है की हिंद महासागर पर अधिक नियंत्रण भारत का हो।  भारत  मॉरीशस के लिए प्रोजेक्ट Trident के तहत मॉरीशस के एनएसजी को अपनी क्षमता का विस्तार करने में सहयोग कर रहा है। मॉरीशस और भारत के बीच 500 मिलियन डॉलर का समझौता दोनों देशों के विकास के प्रति समर्पण को भी  दर्शाता है। इसके अतिरिक्त भारत को हिन्द महासागर में छोटे द्वीप-राज्यों के साथ अधिक मजबूत संबंध बनाए रखना चाहिए। मॉरीशस अपने भारतीय डायस्पोरा के साथ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


-राज कुमार शाही , भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER)